फलीषा
Well done!
उद्देश्य
इस कहानी का मुख्य उद्देश्य बच्चों को यह बताना है कि दूसरों का अच्छा सोचने और करने वालों का साथ भगवान भी देता है इसलिए हमेें हमेशा अच्छे विचार रखने चाहिए ।
कहानी
ईषा केरल के एक छोटे से गाँव में रहती थी। वह कक्षा 9 में पढ़ती थी। उसका गाँव साफ सुथरा और बहुत सुन्दर था। चारों तरफ फैली हरियाली और घने वृक्ष उसके गाँव को और सुन्दर बनाते थे।
ईषा रोज सुबह, इसी हरियाली से गुजरती हुई अपने स्कूल जाती थी।
रास्ते में पेड़ो के नीचे जो भी फल गिरे होते वह उन्हें उठा कर पोछ कर अपने बस्ते में रख लेती।
स्कूल पहुँच कर वह सारे फल दोस्तों में बाँटती और खुद भी खाती। इन्हीं फलों के कारण वह सारे दोस्तों की चहेती बन गई।
कभी वह आम लाती, कभी काजू फल, कभी आँवला और कभी जामुन। बच्चों को इन्तजार रहता कि आज ईषा कौन सा फल लाएगी। जैसे ही बच्चे उसे देखते, दौड़ते हुए उसके पास आ जाते। हाँथ फैला कर कहते, फल ईषा।
धीरे-धीरे बच्चे उसे ईषा नाम की जगह फलीषा नाम से पुकारने लगे। वह पूरे स्कूल में फलीषा नाम से मशहूर हो गई।
जब बच्चे उसे फलीषा नाम से पुकारते तो उसे लगता कि वह फलों की देवी बन गई है। लोगों को फल देना उसका कर्तव्य है।
एक दिन जब वह स्कूल जा रही थी, तो उसे रास्ते में एक भी फल नहीं मिला। उस दिन उसके पास, बच्चों के देने के लिए कुछ भी नहीं था।
जब वह स्कूल पहुँची तो एक साथ सारे बच्चों ने उसे घेर लिया और खाली हाँथ बढ़ा कर फल-ईषा, फल-ईषा कहने लगे।
बच्चों के खाली हाँथों ने उसे झकझोड़ दिया। उसे लगा कि आज फलों की देवी का खजाना खाली हो गया। वह कंगाल हो गई।उसके पास देने के लिए आज कुछ भी नहीं है।
यह सच है कि जब आपको कोई बात बुरी लगती है, तो एक के बाद एक मन में बुरे विचार आने लगते हैं।
ऐसा ही कुछ ईषा के साथ भी हुआ। ईषा सोचने लगी कि, यदि कल भी कोई फल न मिला तो क्या होगा? यदि एक महीने तक फल नहीं मिले तो क्या होगा? यदि एक वर्श तक फल नहीं मिले तो क्या होगा?
क्या बच्चे अपना दिया नाम, फलीषा वापस ले लेंगे? उसे फलीषा कहने पर जो देवी जैसी सुखद अनुभूति होती है, वह उससे छिन जाएगी?
इस सारे प्रश्नों ने उसे हिला दिया। वह अपनी इस सुखद अनुभूति को खोना नहीं चाहती थी।
वह सोचने लगी कि यदि उसे देवी वाली सुखद अनुभूति को जीवित रखना है तो उसे इस समस्या का समाधान आज और इसी समय निकालना होगा।
जैसे ही उसने सोचा कि मुझे इस समस्या का समाधान निकालना होगा, एक दूसरे विचार ने आ कर उसके दिमाग का दरवाजा खटखटाया। वह अपने आप से बोल उठी। दुनिया की कोई भी देवी किसी से ले कर कुछ नहीं देती है। उसके पास अपना स्वयं का खजाना होता है।
उसने तेज आवाज में बच्चों से कहा, बच्चों शान्त हो जाओ और मेरी बात ध्यान से सुनो।
वह बोली: ‘‘दोस्तों आज तक हमने बहुत फल खाए। लेकिन वह फल दूसरे लोगों के द्वारा लगाए गए पेड़ों के थे। हम आज तक औरों के द्वारा लगाए गए पेड़ों के फल खाते थे। अब हम अपने स्वयं के पेड़ों के फल खाएंगे और दूसरों को भी खिलाएंगे। आओ हम शपथ ले कि आज से हम जितने भी फल खाएंगे, उसके लिए एक पेड़ जरूर लगाएंगे। हम इस गाँव में कभी फलों की कमी नहीं होने देंगे। पेड़ लगाने की बात सुनते ही सारे बच्चे खुशी से कूदने लगे, और चिल्लाने लगे ’’हम पेड़ लगाएंगे, फल खाएंगे और खिलाएंगे’’।
पेड़ लगाने का संकल्प ले कर सारे बच्चे गाँव में नए पेड़ लगाने के लिए हर दिशा में चल पड़े।
कुछ ही वर्षों में, वह गाँव फलगाँव के नाम से प्रसिद्ध हो गया और सबसे मजेदार बात तो यह रही कि स्कूल का हर बच्चा अपने टिफिन में खाने की जगह फल लाने लगा।
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