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कछुए और खरगोश, दोनों ने रेस जीती

By Bispl 23 Jul 2026 5 minutes Time To Read Share 🖨️ Print Story 🖨️ Print Story

उद्देश्य
इस कहानी का मुख्य उद्देश्य बच्चों को यह बताना है कि साथ और सहयोग से किसी भी मुश्किल का सामना कीया जा सकता हैं जो अकेले नहीं कीया जा सकता।

कहानी
बहुत पहले जंगल में एक रेस हुई थी। उस रेस में खरगोश और कछुआ दौड़े थे। पहले खरगोश को बडी़ अकड़थी कि वह कछुए से बहुत तेज दौडत़ा है। वह सोच भी नहीं सकता था कि वह रेस में कछुए से हार जाएगा। लेकिन उस दिन वह हार गया। जब रेस चल रही थी, तो बीच में वह गाजरों के खेत में घुस गया। गाजर खा कर उसे मस्ती सवार हो गई। ठण्डी ठण्डी हवा चल रही थी।उसे नींद आ गई और वह सो गया।

जब खरगोश सो रहा था, तब कछुआ आगे निकल गया और रेस जीत गया।

उस दिन खरगोश को अपनी हार पर बड़ी शर्म आई और उसने निश्चय किया कि अब से वह न तो किसी की कमजोरी का मजाक उडा़एगा और न ही अपनी किसी अच्छी आदत की हेकडी़ दिखाएगा।

उस दिन, जब कछुए को रेस जीतने का पुरस्कार मिला तो उसने कछुए को उसकी जीत पर बधाई दी और उसे गले से लगा लिया।

उसने कछुए से कहा, ‘‘भइया, आज तुमने मुझे जो सीख दी है वह अनमोल है। मैं उसे जिन्दगी भर याद रखूंगा। मै हमेशा तुम्हारा दोस्त रहूँगा और हमेशा दोस्ती निभाऊँगा’’।

यह सुनकर कछुआ खुश हो गया और बोला खरगोश भइया, तुमने तो गाजरें खा लीं। तुम्हारा पेट तो भर गया होगा लेकिन मुझे बहुत तेज भूख लग रही है। मुझे भी गाजर खिलाओ न।

दोस्त की बात सुनते ही, खरगोश खुशी से उछलता कूदता गया और उसके लिए एक बडी़ सी गाजर ले आया।

उसी दिन से कछुए और खरगोश में बहुत पक्की दोस्ती हो गई और वह साथ-साथ रहने लगे। वह साथ-साथ खेलते, खाते और मस्ती करते थे। कुछ ही दिनों मेंजंगल के सारे जानवर उसकी दोस्ती की प्रशंसा करने लगे।

कुछ दिनों बाद, जंगल में स्पोर्टस डे मनाए जाने का ऐलान हुआ और निश्चय किया गया कि इस बार केवल ग्रुप रेसें होगी। सभी जानवर पहले अपने ग्रुप बनाएंगे और फिर साथ में दौडे़गे।

कछुए और खरगोश ने अपना नाम हर्डल रेस के लिए दिया। इस रेस में दो जानवरों को साथ दौड़ना था। रेस के रास्ते में जो जो परेशानियाँ आएं, उन्हें मिलकर सुलझाना था और आगे बढ़ते रहना था।

इस रेस में भाग लेने के लिए अनेकों जानवरों ने नाम दिए और आपस में तालमेल बैठाने की प्रैक्टिस करने लगे।

प्रैक्टिस करते हुए खरगोश सारे जंगल में घूमा और उसकी हर सड़क, हर जगह को देखा और याद कर लिया। कछुआ भी उसके साथ-साथ गया और अपनी शक्ति बढ़ाई, जिससेकी वह जल्दी थके नहीं।

रेस वाला दिन आया। हर्डल (बाधा) रेस के लिए सारे जानवर एक लाइन से खड़े हो गए। बन्दर ने रेडी, स्टेडी गो बोला और रेस आरम्भ हो गई। रेस ऊबड़-खाबड़ रास्ते से शुरू हुई।

दौड़ते ही किसी जानवर का पैर मुड़ गया। कोई गढ्ढे में गिर गया तो किसी को चोट लग गई और वह आगे ही नहीं बढ़ पाया।रगोश जानता था कि यह तो शुरूआत हैं आगे का रास्ता तो और खराब है। वह जानता था कि इस रास्ते पर आगे चलते हुए उसका दोस्त किसी भी गढ्ढे में फँस सकता है और यदि वह किसी गढ्ढे मेंफँस गया तो दोनों दोस्त रेस हार जाएंगे।

खरगोश ने कछए, से कहा कि, ‘‘दोस्त रास्ता बहुत खराब है। कहीं गढ्ढे हैं तो कहीं पत्थर हैं। न तो तुम गढ्ढे पार कर पाओंगे और न ही तुम पत्थर पर चढ़ पाओगे। इस लिए आओ तुम मेरी पीठ पर बैठ जाओ। मै तुम्हें लेकर कूदता, फांदता छलांग लगाता जाऊँगा और रेस खत्म कर दूँगा।

बाकी जानवरों में इतनी गहरी दोस्ती नहीं है कि वह अपने पार्टनर को पीठ पर बैठा कर दौडे़। तुम मेरे बहुत अच्छे दोस्त हो। मैं तुम्हेंअपनी पीठ पर बैठा कर सारे जंगल में घूम सकता हूँ। इसलिए आओ मेरी पीठ पर बैठ जाओ’’। कछुऐ ने खरगोश की बात मान ली और उसकी पीठ पर चढ़ लिया। खरगोश कछुए को लेकर जरा सी देर में बहुत आगे निकल गया।

कुछ दूर दौडऩे पर एक नदी आई। अब दोस्तों को नदी पार करनी थी। नदी बहुत चैड़ी थी। नदी का बहाव देखकर खरगोश निराश हो गया। उसने सोचा कि नदी न पार करने के कारण अब वह हार जाएंगे।

लेकिन नदी का तेज बहाव देखकर कछुआ खुश हो गया। वह बोला, ‘‘इस बहाव में कोई भी जानवर पानी में नहीं उतरेगा। लेकिन मै पानी में तैरना जानता हूँ। तुम मेरी पीठ पर बैठ जाओ। अब मेरी बारी है। मै तुम्हें नदी पार कराऊँगा’’।

खरगोश कूद कर कछुए की पीठ पर चढ़ गया। कछुआ खरगोश को लेकर पानी में उतर गया और तैरने लगा। प्रैक्टिस करने से उसका स्टैमिना बहुत बढ़ गया था। वह तेजी से तैरते हए पार निकल गया।

किनारे पर आ कर खरगोश कछुए की पीठ से कूद कर जमीन पर आ गया। उसने हाथ पकड़कर कछुए को पानी से बाहर निकाला।

दोनों दोस्तों ने देखा कि फिनिश लाइन सामने ही है। वहाँ कोई नहीं था। कोई जानवर अभी नहीं आया था। यह देखकर दोनों दोस्तों की खुशी का ठिकाना न रहा। वह तेजी से दौडे़ और मिल कर रेस जीत ली।

बाद में जब दूसरे जानवर आए तो कछुए और खरगोश को पुरस्कार मिला। पुरस्कार लेते समय दोनों दोस्तों को समझ में आ गया कि साथ और सहयोग से ऐसी मुश्किलें पार की जा सकती हैं जो अकेले नहीं की जा सकतीं।

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अच्छा इंसान बनने के लिए कोई निश्चित पाठ्यपुस्तक नहीं होती।
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उत्तम साहित्य हमारे विचारों और मूल्यों को सही दिशा देता है।
हमारा उद्देश्य केवल बच्चों तक अच्छा साहित्य पहुँचाना है, ताकि वे स्वयं प्रेरित होकर बेहतर इंसान बन सकें।

  • सच्चा इंसान बनने के लिए कोई किताब नहीं होती,
    ये सीख दिल की बातों से जन्म लेती है।
    जब अच्छे शब्द मन को छू जाते हैं,
    तो भीतर एक उजली लौ जलती है।

    साहित्य के पन्नों में छिपी होती है प्रेरणा,
    जो चुपके से जीवन को संवार देती है।
    हम तो बस राह दिखाते हैं बच्चों को,
    अच्छी किताबें ही उन्हें महान बना देती हैं।