एक जंगल में एक साही और खरगोश रहते थे । उन दोनों में बड़ी दोस्ती थी । खरगोश रोज सुबह जल्दी उठ जाता था । वह नदी किनारे सैर करने जाता था । सुबह जल्दी उठने और सैर करने से वह दिन भर स्फूर्तिवान रहता था । उसका मन भी प्रसन्न रहता था ।
उसे ध्यान है कि जब से उसने जल्दी उठ कर सैर पर जाना शुरू किया, न तो वह कभी बीमार पड़ा और न ही उसने कभी सुस्ती अनुभव की । यही कारण है कि वह जंगल में होने वाली हर रेस में फस्र्ट आता था और पुरस्कार भी पाता था ।
कल जब वह लम्बी रेस में दौड़ा तो उसके सभी साथी दौड़ के अन्त तक पहुँचते पहुँचते थक गए लेकिन वह थका नहीं । वह लगातार तेजी से दौड़ता रहा और रेस में फस्र्ट आया ।
जब हाथी ने उसे पुरस्कार देने के लिए मंच पर बुलाया तो उसने देखा कि भीड़ में उसकी दोस्त साही, जोर जोर से ताली बजा कर उसकी जीत पर खुश हो रही है । अपनी खुशी व्यक्त करने के लिए वह जोर जोर से उछल रही है ।
साही को उछलता देख कर खरगोश ने मन ही मन निश्चय किया कि वह कल से रोज सुबह साही को भी अपने संग ले कर सैर पर जाएगा । उसे स्फूर्तिवान बनने के लिए प्रेरित करेगा और रेस में भाग लेने के लिए उसका मनोबल भी बढाएगा ।
इसके बाद, साही रोज सबेरे जल्दी उठकर तैयार हो जाती थी । जब खरगोश आता था तो उसके साथ, टहलने के लिए नदी किनारे जाती थी ।
धीरे-धीरे साही का स्वास्थ्य भी बहुत अच्छा हो गया । वह बहुत स्फूर्तिवान अनुभव करने लगी थी । उसकी स्फूर्ति देख कर खरगोश साही से मज़ाक करता था और कहता था कि, अब रेस में तो तुम्हें ही फस्र्ट आया करोगी । मुझे भी हरा दिया करोगी ।
खरगोश की बात सुनकर साही शरमा जाती थी और कहती थी कि खरगोश भैया आपको तो झूठी तारीफ करने की आदत है । आपको रेस में भला कौन हरा सकता है । जंगल के सारे जानवर जानते है कि आपसे तेज कोई नहीं दौड़ सकता ।
गर्मियों में खरगोश और साही ने साथ-साथ सैर पर जाना आरम्भ किया था । धीरे-धीरे जाड़ों का मौसम आ गया फिर भी दोनों ने सैर पर जाना बन्द नहीं किया । वह रोज सुबह सैर करने नदी तक जाते रहे । नदी तक जाने के लिए, वह रोज सेब के बगीचे से गुजरते थे ।
सर्दियों का मौसम सेबों का मौसम होता है । अतः अब बगीचे के पेड़ सेबों से लद गए थे । सेब, खरगोश और साही दोनों को बहुत पसंद थे । जब वह पेड़ों पर लगे लाल लाल पके सेब देखते तो उनके मुँह में पानी आ जाता ।
जब कभी बगीचे से गुजरते हुए, उन्हंे कोई डाल से टूटा सेब दिखाई देता तो वह उसे उठा लेते और उसे अपने संग नदी पर ले जाते ।
पहले वह सेब को नदी के पानी से धो कर साफ कर लेते और फिर मिल बाँटकर खाते । सेब बहुत मीठे, रस से भरे और स्वादिश्ट थे । उन्हें खा कर दोनों को मजा आ जाता था । वह सोचते कि काश लौटते समय भी कुछ सेब गिरे मिल जाते तो मजा आ जाता । वह उन्हें घर ले जाते और उनका जैम, मुरब्बा आदि बनाकर कई दिनों तक खाते । लेकिन लौटते समय जब वह बगीचे से होकर गुजरते तो उन्हें एक भी सेब नहीं मिलता, जिससे वह निराश हो जाते ।
एक रात, अचानक मौसम बदलने लगा । आसमान में काले बादल छाने लगे । कुछ देर बाद हवाएं तेज हो गयीं । आसमान में बिजली चमकने लगी । लग रहा था कि शायद तेज तूफान आएगा । हुआ भी ऐसा ही । तेज हवाएं तूफान बन गयीं । बिजली कड़कने के साथ पानी भी बरसने लगा ।
करीब आधे घन्टे के बाद हवाएं रूकीं, तूफान शान्त हुआ और पानी बरसना भी बन्द हो गया ।
इस सारी हलचल से बेखबर खरगोश और साही, अपने अपने घरों में, बिस्तर में लेटे सो रहे थे । उन्हें पता ही नहीं चला कि कब हवाएं चलीं, कब तूफान आया और कब पानी बरसना बन्द हुआ ।
साही की नींद तब खुली, जब सुबह आ कर खरगोश ने उसका दरवाजा खटखटाया । साही चैंक कर उठी । झटपट तैयार हुई और खरगोश के साथ सैर पर निकल ली ।
जब वह दोनों सेब के बगीचे से हो कर गुजरे, तो उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा । बगीचे की सारी जमीन लाल-लाल पके सेबों से भरी पड़ी थी । सेबों की सुगन्ध से सारा बगीचा महक रहा था ।
सेब देखते ही, दोनों दोस्त अपने को रोक न पाए । दोनों ने एक-एक सेब उठाया और बड़े मजे से खाने लगे ।
खरगोश सेब खाते-खाते बोला, साही बहन हम लोग बड़े दिनों से सेब घर ले जाने की बात सोंच रहे थे । नदी से लौटते समय हम कुछ सेब घर ले जाएंगे ।
खरगोश की बात सुनकर साही हँसने लगी और बोली, आज हमें मौके का लाभ उठाना चाहिए । हम सारे सेब घर ले जाएंगे और जैम, मुरब्बा आदि बनाएंगे ।
खरगोश साही की बात सुन कर खुश हो गया । वह हाँ हाँ करके सिर हिलाने लगा । तभी दोनों ने देखा कि लोमड़ी और उसके परिवार के सभी सदस्य बड़े बड़े झोले लेकर आ रहे हैं ।
उन्हें झोलों के संग आता देख, खरगोश और साही को, यह समझने में देर नहीं लगी कि यदि उन्होंने जरा भी देर की तो लोमड़ी और उसका परिवार सारे सेब झोले में भर कर ले जाएंगे । उनके हाथ कुछ नहीं लगेगा । जैम, मुरब्बे वाला उनका सपना पल भर में उड़न छू हो जाएगा ।
खरगोश बोला, साही ! हम लोग तो छोटे छोटे हैं । लोमड़ियाँ हमसे कितनी बड़ी हैं । उनके पास बड़े-बड़े झोले भी हैं । जब तक हम दो चार सेब उठाकर घर पहुुचाएँगे और वापस आएंगे, तब तक यह लोमड़ियाँ न जाने कितने झोले सेब घर पहुँचा चुकी होंगी ।
साही बहन, इन चतुर लोमड़ियों के सामने, हम दो छोटे लोग कुछ भी नहीं हैं । हमारी सामथ्र्य कुछ भी नहीं हैं । अब समझो कि सारे सेब गए । हमारे सपने भी गए । हमारे अच्छे दिन आने से पहले ही चले गए ।
खरगोश की बात सुन कर साही बोली, ऐसे कैसे चले गए ? हाँ, यह सच है कि यह संकट का समय है । ऐसे समय में हमें हिम्मत नहीं हारनी चाहिए । हमें सूझ-बूझ से काम लेना चाहिए । ऐसे समय में हमें सोचना चाहिए कि हम जो चाहते है, वह कैसे होगा ।
पहले हमें यह निश्चय करना चाहिए कि परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों हमें घबराना नहीं है । हमें अपना ध्यान लक्ष्य से नहीं हटने देना है ।
यह निश्चय करने के बाद हमें नई तरह से समस्या का हल निकालना चाहिए ।
यह कहते ही, साही बोली, खरगोश भइया, तुम जल्दी से इस छोटे पेड़ के नीचे, सेबों का एक ढेर लगाओ । मैं पेड़ पर चढ़ कर सेबों के गट्ठर पर पीठ के बल कूदूँगी । सेब मेरी पीठ पर लगे कांटों में फंस जाएंगे । मैं कुछ और सेब अपने पंजों में पकड़ कर, तुम्हारी पीठ पर चढ़ जाऊँगी ।
तुम मुझे अपनी पीठ पर बैठा कर जल्दी से घर की ओर दौड़ लेना । इस तरह हम एक बार में, कम ये कम बीस पच्चीस सेब घर पहुंचा देंगे।
हम लौट कर जल्दी से वापस आएंगे और फिर से बीस पच्चीस सेब घर पहुँचा देंगे ।
साही की बात सुनकर खरगोश के आश्चर्य का ठिकाना न रहा । वह सोंचने लगा कि साही कितनी बुद्धिमान है । इतनी कठिन परिस्थिति में उसने अपनी बुद्धि के प्रयोग से कितना सही हल निकाला है ।
खरगोश ने साही की बात सुनी और दौड़ दौड़ कर पेड़ के नीचे खूब सेब इकट्ठा कर दिए । साही पेड़ से कूदी और अपने काँटो में ढेर सारे सेब फँसा लिए ।
साही को उलटा गिरता देख कर लोमड़ियों को लगा कि उसका पैर फिसल गया है और वह गिर पड़ी है ।
जब उन्होंने देखा कि साही की पीठ पर ढेर सारे सेब चिपक गये हैं और वह खुद एक गोल मटोल सेब बन गयी है तो हँसते-हँसते उनका बुरा हाल हो गया । उनकी आँख में आँसू आ गये । आँसू की वजह से उन्हें दिखाई देना भी बन्द हो गया ।
वह हँसती रहीं और खरगोश और साही ने मिलकर घर के कई चक्कर लगाएं और सारे सेब घर पहुँचा दिए ।
अन्त में लोमड़ियों को खाली झोला लेकर ही घर वापस जाना पड़ा ।
अगले दिन सुबह, जैसे जैसे खरगोश साही के घर की तरफ बढ़ रहा था, सेब के जैम की महक तेज होती जा रही थी । जैम की महक से, उसके मुँह में पानी आने लगा और वह साही के घर की ओर दौड़ने लगा ।
साही दरवाजे पर खड़ी खरगोश की प्रतीक्षा कर रही थी । उसे देखते ही वह खुशी से उछल पड़ी और बोली आओ खरगोश भैया, सेब का जैम तैयार है । गर्म-गर्म ब्रेड पर लगा कर खाओ, मजा आएगा ।
खरगोश और साही दोनों बैठकर सेबों के जैम का मजा लेने लगे और मजे मजे में उन्होंने जिन्दगी का बहुमूल्य पाठ सीख लिया कि कोई भी काम हमें सूझ-बूझ से करना चाहिए । ऐसा करने से न केवल काम आसान हो जाता है अपितु राह में आने वाली कठिन समस्याएं भी आसानी से हल हो जाती हैं ।